नई दिल्ली।। सुप्रीम कोर्ट ने राइट टु एजुकेशन (शिक्षा का अधिकार) को संवैधानिक रूप से वैध माना है। कोर्ट से हरी झंडी मिलने के बाद अल्पसंख्यक स्कूलों को छोड़कर देश के हर स्कूल पर राइट टु एजुकेशन (आरटीई) आज से ही लागू हो गया है। चीफ जस्टिस एसएच कपाड़िया, जस्टिस केएस राधाकृष्णन और जस्टिस स्वतंत्र कुमार की बेंच ने बहुमत से सुनाए फैसले में कहा कि यह कानून सरकार से वित्तीय सहायता नहीं ले रहे अल्पसंख्यक स्कूलों पर लागू नहीं होगा। शिक्षा के अधिकार कानून के तहत कमजोर वर्गों के बच्चों के लिए सभी सरकारी स्कूलों, वित्तीय सहायता प्राप्त और गैर-वित्तीय सहायता प्राइवेट स्कूलों में 25% रिजर्वेशन होगा।
सरकार ने इस कानून को 2009 में ही लागू कर दिया था, लेकिन प्राइवेट स्कूलों ने इसके खिलाफ याचिका दायर करके कहा था कि यह धारा 19 (1) के तहत कानून निजी शिक्षण संस्थानों के अधिकारों का उल्लंघन करता है। उनका तर्क था कि धारा 19 (1) निजी संस्थानों को बिना किसी सरकारी हस्तक्षेप के अपना प्रबंधन करने की स्वायत्तता देता है। केंद्र सरकार ने इसके खिलाफ दलील दी कि यह कानून सामाजिक और आर्थिक रूप से कमजोर लोगों की उन्नति में सहायक है।
आइए देखें कि इस ऐतिहासिक कानून से आखिर हासिल क्या होने जा रहा है-
-देश के हर 6 से 14 साल की उम्र के बच्चे को मुफ्त शिक्षा हासिल होगी यानी हर बच्चा पहली से आठवीं कक्षा तक मुफ्त और अनिवार्य रूप से पढ़ेगा।
-सभी बच्चों को घर के आस-पास स्कूल में दाखिला हासिल करने का हक होगा।
-सभी तरह के स्कूल चाहे वे सरकारी हों, अर्द्धसरकारी हों, सरकारी सहायता प्राप्त हों, गैर सरकारी हों, केंद्रीय विद्यालय हों, नवोदय विद्यालय हों, सैनिक स्कूल हों, इस कानून के दायरे में आएंगे।
-गैर सरकारी स्कूलों को भी 25 फीसदी सीटें गरीब वर्ग के बच्चों को मुफ्त मुहैया करानी होंगी। जो ऐसा नहीं करेगा उसकी मान्यता रद्द कर दी जाएगी।
-सभी स्कूल शिक्षित-प्रशिक्षित अध्यापकों को ही भर्ती करेंगे और अध्यापक-छात्र अनुपात 1:40 रहेगा।
-सभी स्कूलों में मूलभूत सुविधाएं होनी अनिवार्य हैं। इसमें क्लास रूम, टॉइलेट, खेल का मैदान, पीने का पानी, लंच, लाइब्रेरी आदि शामिल हैं।
-स्कूल न तो प्रवेश के लिए कैपिटेशन फीस ले सकते हैं और न ही किसी तरह का डोनेशन। अगर इस तरह का कोई मामला प्रकाश में आया तो स्कूल पर 25,000 से 50,000 रुपये तक का जुर्माना वसूला जाएगा।
-निजी ट्यूशन पर पूरी तरह से रोक होगी और किसी बच्चे को शारीरिक सजा नहीं दी जा सकेगी।
(नवभारत टाइम्स से साभार)
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