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Tuesday, 15 May 2012

बीटीसी अभ्यर्थियों की नियुक्ति प्रक्रिया पर रुख स्पष्ट करे सरकारMay 15, 07:17 pm.


विधि संवाददाता, इलाहाबाद
इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने अध्यापक पात्रता परीक्षा (टीईटी) चयन के तहत नियुक्ति पर रोक की मांग में दाखिल याचिका की सुनवाई की अगली तिथि 25 मई नियत की है। आज राज्य सरकार की तरफ से न्यायालय में हलफनामा दाखिल कर बताया गया कि उर्दू बीटीसी, विशिष्ट बीटीसी व बीटीसी डिग्रीधारकों को टीईटी मेरिट आधार पर चयन प्रक्रिया से अलग रखा गया है। इन डिग्रीधारकों को भी अन्य टीईटी उत्तीर्ण अभ्यर्थियों के चयन में शामिल करने का फैसला लिया था जिसे सरकार ने वापस ले लिया है। अब इन डिग्रीधारकों का अलग से चयन किया जाएगा।
सरकार के इस हलफनामे के बाद न्यायालय ने पूछा कि इनकी चयन प्रक्रिया कब शुरू होगी। इन डिग्रीधारकोंने याचिका दायर कर मांग की है कि उन्हें दुबारा प्रशिक्षण लेने के लिए बाध्य न किया जाय और चयनित अभ्यर्थियों की सीधी नियुक्ति कर दी जाय। इस पर न्यायालय ने सरकार का रुख जानना चाहा। कपिलदेव व अन्य की याचिका की सुनवाई न्यायमूर्ति अरुण टण्डन कर रहे हैं।
न्यायालय में मा.शि.चयन बोर्ड ने सभी जिला बेसिक शिक्षा अधिकारियों की तरफ से नियुक्ति का आदेश जारी किया था जिसकी वैधता को याचिका में चुनौती देते हुए कहा गया कि सक्षम प्राधिकारी बीएसए हैं। याची के अधिवक्ता आलोक यादव का कहना था कि बोर्ड द्वारा जारी आदेश विधि विरुद्ध है। इस पर न्यायालय ने नियुक्ति पर रोक लगा दी है। सरकार ने अब उपरोक्त बीटीसी डिग्रीधारकों की भर्ती का अलग से विज्ञापन निकालने का फैसला लिया है। इस पर न्यायालय ने अगली सुनवाई की तिथि 25 मई नियत की है
साभार दैनिक जागरण 

Monday, 14 May 2012

लोक तंत्र का चौथा स्तम्भ या अंधे अंधा ठेलिया दोनों कूप पडंत

कमर खुजाला नामक समाचार पत्र अक्सर टी ई.टी परीक्षा निरस्त करवाया करता है,जैसे एक बानगी देखे 

    UPTET :  टीईटी घोटाला - जेडी और डीआईओएस दफ्तर में जांच

एंटीकरप्शन टीम ने लिया अफसरों की भूमिका का ब्यौरा

कानपुर। टीईटी घोटाले की जांच कर रही पुलिस की एंटीकरप्शन शाखा की दो सदस्यीय टीम ने शुक्रवार को संयुक्त शिक्षा निदेशक (जेडी) और डीआईओएस कार्यालय में छानबीन की। लखनऊ से टीम के आने से कार्यालय में हड़कंप मचा रहा। जेडी और डीआईओएस के कार्यालय में न होने पर टीम ने विभाग के बाबुओं से परीक्षा प्रक्रिया की पड़ताल की। वहीं, डीआईओएस द्वितीय से भी परीक्षा में उनकी भूमिका के बारे में पूछा।
इंस्पेक्टर आरके सिंह के नेतृत्व में एंटीकरप्शन की टीम शुक्रवार दोपहर चुन्नीगंज स्थित जेडी कार्यालय पहुंची। जेडी माया निरंजन के कार्यालय में न मिलने पर विभाग के बाबुओं से प्रश्न पत्रों की गोपनीयता, प्रश्न पत्र रखने के स्थान, परीक्षा केंद्रों पर प्रश्नपत्र पहुंचाने और ओएमआर शीट को सील बंद करने की प्रक्रिया के बारे में पूछा। इसके बाद टीम डीआईओएस कार्यालय पहुंची। डीआईओएस शिवसेवक सिंह के न होने पर टीम ने डीआईओएस द्वितीय विभा शुक्ला से परीक्षा केंद्र निर्धारण में उनकी भूमिका और परीक्षा के दौरान केंद्रों का दौरा करने के बारे में पूछा। उन्होंने बताया कि परीक्षा केंद्र निर्धारण में उनकी कोई भूमिका नहीं थी जबकि पांच केंद्रों का निरीक्षण उन्होंने किया था


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अब जरा टी ई टी के मार्गदर्शी  जी.ओ. (इसे आप  http://www.scertup.org/TET_RELATED_GOVT_ORDERS.pdf  पर डाउनलोड कर सकते है।  )में लिखे शब्दों पर गौर करे -
पेज संख्या

परीक्षा का आयोजन - 10 मद संख्या 12
"शिक्षक पात्रता परीक्षा -उत्तर प्रदेश "  मंडल मुख्यालय के जिलाधिकारी की अध्यक्षता एवं देख-रेख में   
मंडलीय मुख्यालयों पर आयोजित कराई जायेगी. जनपद स्तर पर परीक्षा संचालन हेतु समीति पूर्णतः सक्षमं एवं उत्तरदायी होगी. इस हेतु परीक्षा केन्द्रों का निर्धारण निम्नलिखित समिति द्वारा किया जायेगा 
(क) जिलाधिकारी                                                                                                   अध्यक्ष 
(ख) मंडलीय संयुक्त शिक्षा निदेशक                                                                        सदस्य  सचिव 
(ग)जिला विद्यालय निरीक्षक(मंडलीय मुख्यालय )                                               सदस्य
(घ ) प्राचार्य डायट (मंडलीय मुख्यालय )                                                                सदस्य
(च )   मंडलीय सहायक  शिक्षा निदेशक बेसिक                                                      सदस्य

अब जरा मेरे द्वारा निकाले गए निष्कर्षो पर ध्यान दे  

1. जैसाकि  बार बार  कमर खुजाला द्वारा लिखा जाता है की 800 लोगो लिए शिक्षा विभाग के एक उच्च अधिकारी द्वारा अलग केंद्र बनवाया गया था .आज तक ना ही उस केंद्र ,शहर और उस अधिकारी का नाम उजागर किया गया है। क्या पांच सदस्यीय समित्ति जिसका प्रमुख मंडल का जिलाधिकारी 
है ,से एक केंद्र अपने मनमाफिक बनवाया जा सकता है? इसी जी ओ. के पेज 13 पर मद 18 देखे जिसमे लिखा है कि  यह एक संवेदनशील परीक्षा है।यदि मान ले  कि  एक मनमाफिक केंद्र बन भी गया तो क्या एल्फाबेटिक  क्रम  आवंटित अनुक्रमाकों को वहा  किस प्रकार भेजा गया .आप किसी भी मंडल का कोई भी नाम www.uptet2011.com  पर चेक  करे आपको अनुक्रमांक  एक  एल्फाबेटिक क्रम में मिलेंगे।
2.जब मेरे जैसा साधारण व्यक्ति इस जी ओ. को scert  की वेब साईट  से प्राप्त कर सकता है तो सर्व सामर्थ्यवान  विजिलेंस विभाग को ये जी ओ. लेने के लिए जे डी  कार्यालय के बाबुओ से  क्यों बात करनी पडी।
3. जैसाकि  बार बार कमर खुजाला लिखता है कि  फॉर्म बिक्री घोटाला .संजय मोहन ने पंजाब नेशनल  बैंक में एक खाता  खुलवाया गया. अब जरा इसी जी ओ. के पेज संख्या 7 के मद संख्या 5(2) को पढ़े "परीक्षा हेतु राष्ट्रिय कृत बैंक में अलग से एक खाते का संचालन किया जायेगा। ये  खाता पद नाम से खोला गया है ना की संजय मोहन के व्यक्तिगत नाम से।
4. ऊपर समाचार में आपने पढ़ा होगा की OMR शीट शील बंदी प्रक्रिया ,प्रश्न पत्र रखने का स्थान आदि के बारे में बाबुओ से पूछ ताछ किया गया।इसके लिए कृपया जी ओ. के पेज 11 का मद 14 और 15 को  देखे।इसमें साफ़ साफ़ लिखा है की जिलधिकारी प्रश्न पत्रों को दोहरे ताले मे कोषागार  में सुरक्षित  रखवायेंगे।और OMR को भली भांति  शील्ड करा के जिलाधिकारी निर्दिष्ट स्थान पर भेजेंगे।
5. रही बात OMR पर सफ़ेद फ्लूड  लगाने की बात तो OMR  में साफ़ साफ़ लिखा था यदि कोई अभ्यर्थी एक से ज्यादा उत्तर देता है दो उसे अंक नहीं दिए जायेंगे. यदि ऐसा OMR  जांचने वाली संस्था ने फ्लूड  लगे OMR  पर अंक दिए है तो ऐसे लोग आसानी से चिन्हित किये जा सकते है।क्योकि OMR  की एक प्रति राज्य सरकार के पास सुरक्षित है।एक बात और राज्य स्तरीय स्टीयरिंग कमेटी के अध्यक्ष  संजय मोहन नहीं थे .इसके अध्यक्ष सचिव बेसिक शिक्षा थे (देखे जी ओ. का पेज 13 मद 18) थे।ये कमेटी TET  की शुचिता बनाये रखने की जिम्मेदार है।
अब एक बात  निश्चित तौर पर कही जा सकती है कि  क्यों  दैनिक जागरण ने अपने सहारनपुर के 04 मई के अंक में निम्न  लेख क्यों लिखा 

परीक्षा का आधार बदलना टेढ़ी खीर

सहारनपुर : टीइटी से प्राथमिक स्कूलों में नियुक्ति का आधार बदलने या उसे रद करने की कोशिश सरकार को भारी पड़ेगी। बसपा सरकार ने टीइटी के पात्रता परीक्षा के आधार को बदलकर मेरिट की श्रेणी में शामिल किया था। अब सपा सरकार परीक्षा के आधार को दोबारा पात्रता परीक्षा करने की कसरत में जुटी है। पूरे मामले में कानूनी राय अहम होगी और इसे नजरअंदाज करना सरकार के गले की फांस बन सकता है। इन दिनों टीइटी से प्राथमिक शिक्षकों की भर्त्ती पर परीक्षा में उत्तीर्ण रहे 2.70 लाख अभ्यर्थियों की निगाहें लगी हैं। स्कूलों में नियुक्ति मिलेगी या फिर कानूनी जंग लड़नी होगी? मामले को लेकर मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को ज्ञापन भेजने व विभिन्न जिलों में धरना-प्रदर्शन का क्रम जारी है। प्रदेश सरकार भी टीइटी को लेकर खासी चुस्त नजर आ रही है। मामले में पहले गठित बेसिक शिक्षा विभाग की एक कमेटी ने टीइटी को रद करने की सिफारिश की थी। बाद में मुख्य सचिव की अध्यक्षता वाली कमेटी द्वारा टीइटी को रद्द न करने की बात कही थी। कमेटी ने मेरिट के आधार को बदलकर टीइटी को केवल पात्रता परीक्षा बनाने पर सहमति दी है। हालांकि इस बारे में अभी कोई अंतिम निर्णय नही हुआ है। जाल का नहीं कोई तोड़बेसिक शिक्षा विभाग के उच्च पदस्थ सूत्रों का दावा है कि टीइटी परीक्षा की गाइडलाइन का कोई तोड़ नहीं है। उनका दावा है कि बसपा सरकार ने टीइटी को पात्रता की श्रेणी से हटाकर मेरिट के आधार में बदलने का जो निर्णय लिया था वह मंत्रिमंडल का सामूहिक निर्णय था। उनका तर्क है कि एक मामले में पूर्व में हुआ निर्णय इसमें भी मील का पत्थर साबित हो सकता है। इसके मुताबिक परीक्षा से एक दिन पूर्व तक ही सरकार परीक्षा/नियुक्ति को बनाए नियमों में बदलाव कर सकती है। बाद में किसी भी प्रकार का बदलाव नियुक्ति के आधार के संबंध में नहीं किया जा सकता। टीइटी प्रक्रिया में कानूनी जंग से बचने के लिए प्रदेश सरकार के लिए कानूनी राय अहम होगी। 



Thursday, 3 May 2012

मित्रों! घबराएँ नहीं, सुबह होने वाली है!

Dear Ranjan,

Please publish the matter on blog so that candidates can understand
the situation on the WRIT-A No. 76039/2011 and can decide their next
move.

Thanks.




(अगर कुछ मित्रों को लगता है कि मैं केवल उन्हें झूठा दिलासा देने के लिए
कुछ न कुछ लिखता रहता हूँ तो कृपया अपने विचार जरुर लिखे. वैसे मेरा
मानना है कि यदि किसी भी व्यक्ति, वस्तु या विषय के  सकारात्मक पक्ष
ज्यादा मजबूत दिखें तो यह तय हो जाता है कि उसके नकारात्मक पक्षों पर
विजय पाई जा सकती है. चूंकि नकारात्मक पक्ष दिखने वालो की कमी आज संसार
में नहीं है इसलिए मै आपको सकारात्मक पक्ष  दिखाने का प्रयास करता रहता
हूँ. )



मित्रों आज आपके लिए ज्यादा कुछ तो नहीं पर जरा सी बात, जो कल अदालती
कार्यवाही के बाद मिली ख़बरों के बाद मुझे समझ में आ रही है, आपसे बताना
चाहता हूँ ताकि आपके मन में छाया  निराशा का अँधेरा कुछ कम हो सके. आज तक
टी.ई.टी.उत्तीर्ण अभ्यर्थियों के साथ जो कुछ होता आया है और हो रहा है वह
निहायत दुर्भाग्यपूर्ण रहा है पर कल के अदालत के निर्णय से लग रहा है कि
भर्तियाँ अब शुरू होंगी और इस बार जब प्रक्रिया शुरू होगी तो उसमे कोई
रुकावट नहीं आएगी. माना कि हम सभी को बहुत ख़ुशी होती अगर न्यायालय
विज्ञापन पर से रोक हटा लेता या अदालत द्वारा रद्द किये जाने की दशा में
सरकार संशोधित विज्ञापन निकलती और भर्ती प्रक्रिया शुरू होती. पर  यह
अच्छा हुआ कि कल न्यायालय ने एक ऐसा फैसला नहीं किया जिसके खिलाफ निश्चित
तौर पे बी.टी.सी./विशिष्ट बी.टी.सी. वाले अभ्यर्थी पुनः कोर्ट जाते और
मामला फिर लटक जाता. न्यायालय ने मामले को गंभीरता से लेते हुए इस सारे
प्रकरण से सम्बंधित सभी पक्षों की आपत्तियों को ध्यान में रखकर राज्य
सरकार से हलफनामा माँगा है ताकि भर्ती से सम्बंधित सभी प्रश्नों का
समाधान इसी केस के निर्णय द्वारा हो जाये और प्रक्रिया एक बार शुरू होने
के बाद निर्विवाद और निर्विरोध पूरी हो.

ध्यान दें कि यह विज्ञापन "प्राइमरी शिक्षकों" की भर्ती का नहीं, बल्कि
"प्रशिक्षु प्राइमरी शिक्षकों" (एन.सी.टी.ई. के नियमानुसार अध्यापक के
रूप में नियुक्त ऐसे बी.एड.योग्यताधारक जिन्हें नियुक्ति के उपरांत 6 माह
का विशेष प्रशिक्षण करना अनिवार्य है) की भर्ती के लिए जारी किया गया था
क्यूंकि उसे जारी करते समय सरकार/बेसिक शिक्षा विभाग का ध्यान उन लगभग 2
से 3  हज़ार बी.टी.सी./विशिष्ट बी.टी.सी. अभ्यर्थियों की तरफ नहीं गया
जिन्हें एन.सी.टी.ई. के नियमानुसार कोई विशेष प्रशिक्षण प्राप्त करने की
आवश्यकता नहीं है. ऐसे में ये उम्मीद करना कि बी.टी.सी./विशिष्ट
बी.टी.सी. वाले अभ्यर्थी  गैरजरूरी ट्रेनिंग करेंगे और सहायक अध्यापक के
वेतनमान के बदले 6  महीने तक प्रशिक्षु अध्यापक का वेतनमान स्वीकार करने
को राजी होंगे, हास्यास्पद है.  जाहिर है, ये सवाल उठाना ही था और इसका
हल किये बिना प्रक्रिया पूरी नहीं हो सकती थी और अच्छा हुआ, कि समय रहते
यह सवाल उठा और वर्तमान केस के साथ इसका भी समाधान हो रहा है. यहाँ ये भी
स्पष्ट करना जरुरी है कि बी.टी.सी./विशिष्ट बी.टी.सी. वाले टी.ई.टी.
उत्तीर्ण अभ्यर्थी और बी.एड.डिग्रीधारक अन्य अभ्यर्थी  में सिर्फ इतना
फर्क होगा कि उन्हें ट्रेनिंग नहीं करनी होगी और उनकी नियुक्ति
"प्रशिक्षु प्राइमरी शिक्षकों"  के तौर पर नहीं, "सहायक अध्यापक" के तौर
पे होगी.

अच्छी बात तो ये हुई कि विज्ञापन और अब तक घोषित सरकारी नीति के अनुसार
चयन की मेरिट टी.ई.टी. के आधार पर बनेगी. और बी.टी.सी./विशिष्ट बी.टी.सी.
वाले टी.ई.टी. उत्तीर्ण अभ्यर्थी और बी.एड.डिग्रीधारक अन्य अभ्यर्थियों
की संयुक्त मेरिट बनाने को लेकर कोई समस्या नहीं आएगी क्यूंकि अगर मेरिट
अकादमिक के आधार पे बनती तो बी.एड. और बी.टी.सी./विशिष्ट बी.टी.सी.
प्राप्तांको को मिलने वाले वेटेज को लेकर नया पेंच पैदा हो सकता था और
दोनों की अलग-अलग मेरिटलिस्ट बनने की दशा में 72825 रिक्तियों में किसको
प्राथमिकता दी जाये, ये सवाल खड़ा होता, पर सिर्फ टी.ई.टी.मेरिट के आधार
पर चयन होने से किसी विवाद की सम्भावना नहीं रहेगी. इन 72825 रिक्तियों
के लिए टी.ई.टी. मेरिट के आधार पर बी.एड. और बी.टी.सी./विशिष्ट बी.टी.सी.
वाले अभ्यर्थियों की संयुक्त मेरिट लिस्ट बनाकर चयन होगा. ऐसे में अब
स्पष्ट हो रहा है कि टी.ई.टी. द्वारा चयन से एक और प्रश्न खुद ब खुद हल
हो जाता है. मेरिट के आधार पर मचे बवाल के बारे में मेरा कहना है कि
वास्तव में अब तक तो टी.ई.टी. मेरिट बनाम अकादमिक मेरिट की बातें सिर्फ
फर्जी पत्रकारों, सरकारी दफ्तरों के जूनियर क्लर्क और चपरासियों की
गप्पों से उडी अफवाह मात्र है जिसे अकादमिक समर्थको ने अपने मन की तसल्ली
के लिए बढ़ा-चढ़ा कर पेश किया है और सशंकित टी.ई.टी. मेरिट-समर्थकों ने
बराबर प्रत्युत्तर देकर इस आग को भड़काया है. भला कोई भी बता सकता है कि
कब मुख्यमंत्री, बेसिक शिक्षा मंत्री, बेसिक शिक्षा सचिव या निदेशक ने
मेरिट के आधार की बात अधिकृत रूप से की है?  ये तो वही बात हुई कि  सिर्फ
'कौवा कान ले गया!" सुनकर सब कौवे के पीछे भागे पर अपना कान किसी ने छूकर
नहीं देखा.

यह भी बतलाना चाहूँगा कि हो सकता है कि अदालत कपिल देव यादव की नीयत को
जानकर भी विज्ञापन को निरस्त करने को नियम-विरुद्ध होने के कारण, यानि
बी.एस.ए. की जगह माध्यमिक शिक्षा परिषद् के सचिव द्वारा निकले जाने के
कारण,  मजबूर हो क्यूंकि कानून सिर्फ नियमों के आधार पर फैसला करती है.
पर विज्ञापन रद्द होने की दशा में भी शिक्षा के अधिकार अधिनियम, 2010  की
शर्तें पूरी करने के लिए राज्य सरकार द्वारा भर्ती की ही जानी है अन्यथा
उसे न सिर्फ केंद्र से मिलने वाली सहायता पर रोक लगेगी और राज्य यह बोझ
नहीं उठा सकता बल्कि शिक्षा का अधिकार अधिनियम के अंतर्गत उत्तर प्रदेश
अपनी नियमावली बनाकर अधिसूचित भी कर चुका है और छात्र-शिक्षक अनुपात पूरा
करने के लिए भर्ती करने को संवैधानिक रूप से बाध्य है. ऐसा न करने पर
किसी व्यक्ति द्वारा जनहित याचिका दायर करने की दशा में अदालत सरकार से
जवाब-तलब कर सकती है, भर्ती के लिए तय नीति और उठाये गए क़दमों का ब्यौरा
मांग सकती है और उसे निर्देश भी दे सकती है. केंद्र सरकार द्वारा भी
अध्यापकों की नियुक्ति को लेकर राज्य पर दबाव है क्यूंकि राज्य केंद्र से
इन भर्तियों से बढ़ने वाले वित्तीय खर्च का 65 % अंशदान ले चुका है. अतः
विज्ञापन रद्द होने की स्थिति में भी सरकार मजबूर होगी कि अपनी भूल
सुधारते हुए नया विज्ञापन निकाले.

पर एक बात ध्यान जरुरी है कपिल जैसे अड़ंगेबाजों द्वारा को ध्यान में
रखते हुए लग रहा है कि अब न्यायालय चाहे कोई भी फैसला दे, बी.एड.
डिग्री-धारकों की प्राइमरी टीचरों के रूप में नियुक्ति तभी संभव है जब
केंद्र सरकार राज्य सरकार के अनुरोध पर समयसीमा बढ़ा दे. हाईकोर्ट ने भी
बी.टी.सी.+टी.ई.टी. उत्तीर्ण आवेदकों पर पहले विचार करने यानि उनसे भर्ती
पूरी करने की बात कही है तो उसका कारण एन.सी.टी.ई. द्वारा बी.एड.
डिग्री-धारकों की प्राइमरी टीचर के तौर पे नियुक्ति के लिए दी गई समय
सीमा, 01.01.2012  तक नियुक्ति न हो पाना हो सकता है. ऐसी स्थिति में भी
राज्य-सरकार सिर्फ बी.टी.सी.+टी.ई.टी. उत्तीर्ण आवेदकों  के द्वारा भर्ती
पूरी करने का कदम इसलिए नहीं उठा सकती क्यूंकि सबको पता है कि राज्य में
शिक्षकों की आवश्यकता को पूरा करने के लिए पर्याप्त संख्या में ऐसे
बी.टी.सी. उत्तीर्ण अभ्यर्थी हैं ही नहीं जिन्होंने टी.ई.टी. उत्तीर्ण
किया हो. पर एन.सी.टी.ई. की ख़त्म हो चुकी समय सीमा के आधार पर एक मजबूत
अडंगा लगाया जा सकता है.  राज्य सरकार के लिए भी यहाँ केवल 72825
भर्तियों की बात सोचना अदूरदर्शिता होगी क्यूंकि प्राइमरी शिक्षकों की
मौजूदा आवश्यकता, जो लगभग 2 लाख है, को देखते हुए यह विचार भी जरुरी है
कि एक बार अगर राज्य-सरकार ने बी.एड.डिग्री-धारकों को दरकिनार करते हुए
केंद्र से अनुरोध करके उपरोक्त समय-सीमा बढवाने के बजाय फ़िलहाल ये 72825
भर्तिया बी.टी.सी.+टी.ई.टी. अभ्यर्थियों से भर ली तो आगे भी अध्यापकों के
पद सालों तक खाली पड़े रहेंगे क्यूंकि इतने बी.टी.सी.+टी.ई.टी. उत्तीर्ण
अभ्यर्थी न तो अभी प्रदेश में हैं न ही हर साल तैयार होने वाले लगभग
20000 बी.टी.सी. उत्तीर्ण अभ्यर्थी टी.ई.टी. में उत्तीर्ण ही हो जायेंगे,
इस बात की कोई गारंटी नहीं है. ऐसे में प्रदेश आने वाले कई सालों तक
शिक्षकों की भरी कमी से जूझेगा, प्रदेश के नौनिहाल मास्टर-जी की राह
देखेंगे और शिक्षा का अधिकार अधिनियम के उद्देश्य खाक में मिल जायेंगे.

ऐसी स्थिति में पहले तो बी.टी.सी.+टी.ई.टी. उत्तीर्ण अभ्यर्थियों पर पहले
विचार करने का कोर्ट का सुझाव राज्य-सरकार के लिए कतई  व्यावहारिक नहीं
होगा. जज महोदय ने जो कमेन्ट किया है वो आज की स्थिति के कानूनी पहलुओं
को ध्यान में रखकर कहा है, पर सरकार को प्रदेश चलाने के लिए अपने विवेक
का भी इस्तेमाल करना है. अगर आज प्रदेश सरकार ने दूरदर्शिता का परिचय
देते हुए अगर समय रहते केंद्र से समयसीमा बढवा ली होती, जो की उसे वैसे
भी करवानी ही पड़ेगी, तो कोर्ट ऐसा नहीं कहता. मौजूदा स्थिति में जज महोदय
कानून के अंतर्गत ही बात कर सकते हैं और एन.सी.टी.ई. के नियम के विपरीत
01.01.2012  के बाद प्राइमरी टीचर के तौर पे बी.एड. डिग्रीधारकों की
नियुक्ति को चुनौती  दिए जाने को गलत नहीं ठहरा सकते. पर आनेवाले कल के
मद्देनज़र न सिर्फ राज्य सरकार की मज़बूरी है कि वास्तविक स्थिति को
नकारने की जगह उसे स्वीकारते हुए केंद्र से समयसीमा बढाने का अनुरोध करे
बल्कि शिक्षा के अधिकार का अधिनियम उत्तर प्रदेश जैसे बड़े और महत्वपूर्ण
राज्य में सफलता पूर्वक लागू करने के लिए केंद्र सरकार और एन.सी.टी.ई. को
भी समयसीमा बढाने की अनुमति देनी ही पड़ेगी.

अतः आप मित्रों से निवेदन है कि जहाँ आपने इतना धैर्य रखा है, थोडा और
रखे, इतनी बाधाएँ झेली हैं तो जो बाधाएँ आगे आ सकती हैं, उनसे भी निपटकर
ही आगे बढ़ें, ताकि सीधे मंजिल पर ही जा कर रुकें.

पर ये भी ध्यान रखें कि ये बातें सच होते हुए भी तबतक बेमानी हैं जबतक
इन्हें कोर्ट के सामने न रखा जाये. इसलिए टी.ई.टी. के नेताओं से पुनः
अनुरोध है कि कृपया इन भर्तियों पर आस लगाये बैठे लाखों अभ्यर्थियों की
भावनाओं का ध्यान रखते हुए उन्हें सच-सच बताएं की क्या हम इस केस में
थर्ड पार्टी हैं कि नहीं. आप सब जानते हैं कि अब तो कितनी याचिकाएं इस
याचिका से जुडी हैं, फिर हम पार्टी क्यूँ नहीं बने, अगर हम पार्टी नहीं
बने तो हमारा पक्ष, जिनमे से कुछ का जिक्र अपनी छोटी सी बुद्धि के अनुसार
ऊपर किया है, कौन रखेगा क्यूंकि अन्य पक्ष तो कोर्ट में अपनी अपनी बात
कहेंगे और कोर्ट वही सुनेगा जो उस से कहा जायेगा. कृपया इन नेताओं को
जानने वालों से भी अनुरोध है की वो इनसे ब्लॉग पर आकर स्थिति स्पष्ट करने
और जरुरी कदम उठाने या फिर सीधे-सीधे इंकार करने को कहें ताकि बाकि लोग
इनका भरोसा छोड़कर अपने हिसाब से कदम उठाये. मेरी बात से किसी को ठेस
पहुचे तो कृपया क्षमा करें क्यूंकि मेरा इरादा किसी पर आरोप लगाना नहीं
सिर्फ आपको स्थिति से अवगत कराना है ताकि आप समय रहते क़दम उठा सकें..
धन्यवाद!!

आपका
श्याम देव मिश्रा
मुंबई

Tuesday, 1 May 2012

यू.पी.टी.ई.टी. - 2011 और 72825 प्राइमरी शिक्षकों की भर्ती: मौका-मुआयना

उत्तर प्रदेश में इन दो विषयों पर रोज-रोज अख़बारों और अन्य माध्यमों से
कभी सही तो कभी गलत तो कभी भ्रामक ख़बरें  आ रही है और सम्बंधित
अभ्यर्थियों में बेचैनी, निराशा व आक्रोश बढ़ रहा है. पर इतना जन लेना
शायद आपको राहत दे  कि "भले ही सच कहा न जाये, सच सच ही रहता है और झूठ
चाहे जितनी बार, जितनी जोर बोला जाये, झूठ झूठ ही रहता है.
आइये, एक बार देख लें इन प्रश्नों को जिनको लेकर दुविधा है;
1. क्या टी.ई.टी. मेरिट से चयन गलत है?
कानून के हिसाब से गलत सिर्फ वो कृत्य है जो किसी के द्वारा अपने
अधिकार-क्षेत्र से बहार जाकर या फिर नियमों के विरुद्ध किया गया हो. यदि
भर्ती-प्रक्रिया शुरू होने से पूर्व राज्य-सरकार (उत्तर प्रदेश सरकार,
नाकि सपा सरकार या बसपा सरकार) द्वारा अपने अधिकारों के अंतर्गत उ.प्र.
बेसिक शिक्षा (अध्यापक) सेवा नियमावली, 1981 में 12वें संशोधन द्वारा
भर्ती-प्रक्रिया संबंधी नियम बनाये गए और उसके आधार पर प्रक्रिया शुरू
हुई तो यह कहीं से नियम विरुद्ध नहीं है. वैसे भी एन.सी.टी.ई. द्वारा
टी.ई.टी. अनिवार्य किये जाने के कारण भर्ती के नियमों में संशोधन इसलिए
आवश्यक था क्यूंकि पहले पात्रता में टी.ई.टी. का कोई उल्लेख ही नहीं था
और नई भर्ती के लिए अब टी.ई.टी. की अनिवार्यता के लिए इसे आवश्यक
योग्यताओं में शामिल करना था. दूसरा, जब राज्य-सरकार ने इस संशोधन में जो
टी.ई.टी. मेरिट को चयन का आधार बनाया, वो भी राज्य-सरकार के अधिकार
क्षेत्र में था और एन.सी.टी.ई. दिशानिर्देशों के अनुरूप था. इसका विरोध
करने वालों को जन लेना चाहिए कि 72825 पदों की भर्ती के प्रस्ताव, जिसमे
भर्ती के नियम व पूरी प्रक्रिया का ब्यौरा शामिल था, को स्वयं केन्द्रीय
मानव संसाधन विकास मंत्रालय और एन.सी.टी.ई. द्वारा स्वीकृति दी गई थी जिस
से स्पष्ट है कि यह नियम-सम्मत था. भर्ती प्रक्रिया में नियमों का
उल्लंघन होने पर ही न्यायालय से राहत मिलती है न कि सिर्फ इसलिए कि इस से
शिकायत करने वाले के हित प्रभावित हो रहे हैं. किस आधार पे चयन होना है,
इसके लिए आप नियम बनाने की अधिकृत संस्था से गुजारिश कर सकते है या अपने
सुझाव दे सकते है, वो भी अगर आपसे पूछे तब, पर आप उसे कटघरे में महज इस
लिए खड़ा नहीं कर सकते कि आपको ये ठीक नहीं लग रहा है. पहले भी कई लोगो ने
अलग अलग आरोप और बहानों से अदालत में टी.ई.टी. के मद्धम से चयन पर सवाल
उठाया है पर हर बार कोर्ट ने इसे सही ठहराया है, इसलिए अगर 2 मई को कोर्ट
इस विज्ञापन को सही ठहराता है या केवल यही विज्ञापन सक्षम प्राधिकारी
अर्थात बी.एस.ए. द्वारा निकले जाने का आदेश देता है तो "टी.ई.टी. बनाम
अकादमिक"  कोई मुद्दा ही नहीं है क्यूंकि इसी विज्ञापन में प्रक्रिया
शुरू होने के पूर्व सरकार द्वारा जारी शासनादेश के अंतर्गत टी.ई.टी. के
आधार पर चयन का स्पष्ट उल्लेख है.
2. क्या भर्ती का आधार बदला जा सकता है?
भर्ती का आधार बदलने की आवश्यकता स्वाभाविक रूप से केवल तभी होती है जब
कोई प्रक्रिया शुरू होने वाली हो, या भर्ती का आधार अवैध या नियम-विरुद्ध
हो. यहाँ भर्ती की प्रक्रिया शुरू भी हो चुकी है और आवेदन भी किये जा
चुके हैं. दूसरा, भर्ती के आधार, अर्थात टी.ई.टी. मेरिट के आधार पर चयन
को केंद्र सरकार और एन.सी.टी.ई. ने भी स्वीकृति दे दी है और कोर्ट ने भी
इसके खिलाफ दायर याचिकाओं को ख़ारिज करते हुए एकाधिक बार इसे सही व
नियम-सम्मत ठहराया है. अतः कानूनी रूप से भर्ती के आधार को बदले जाने की
कोई आवश्यकता वर्तमान स्थिति में नहीं है, भले ही कोर्ट विज्ञापन रद्द
करे, या सक्षम प्राधिकारी द्वारा पुनः विज्ञापन जारी करने का निर्देश दे
क्यूंकि "टी.ई.टी. बनाम अकादमिक" एक कानूनी सवाल नहीं है.
हाँ, अगर समाजवादी पार्टी इसे बदलना चाहती है तो अलग बात है. इस स्थिति
में अगर इसे समाजवादी पार्टी के नजरिये से, वोट-बैंक के चश्मे से देखा
जाये तो किसी और को तो नहीं, इन्हें इस आधार को बदलने की जरुरत हो सकती
है. पुस्तक-परीक्षा के रूप में दुस्साहसिक, स्वार्थ-पूर्ण और
शिक्षा-प्रणाली के साथ खुले-आम ऐसा घटिया मजाक करने वाली पार्टी ने अगर
वाकई अब भी अपना चरित्र नहीं बदला है और मात्र वोट-बैंक की परवाह करे तो
टी.ई.टी. के समर्थक 72825 संभावित चयनितों की अपेक्षा लाखों कम अंक वाले
अभ्यर्थियों का समर्थन पाने ले लिए परीक्षा का आधार बदलने की हद तक जा
सकती है. अगर राज्य सरकार, यानि सपा सरकार ऐसा चाहती है तो इस के लिए
सर्वाधिक अनुकूल स्थिति होगी की 2 मई को कोर्ट विज्ञापन को रद्द करे, तभी
सरकार इसकी आड़ में नियम में, भर्ती-आधार में बदलाव कर नया विज्ञापन जारी
करे क्यूंकि मौजूदा विज्ञापन के न्यायालय द्वारा वैध ठहराए जाने और
प्रभावी रहने की दशा में राज्य-सरकार के पास बिना किसी औचित्य के आधार
में बदलाव करना लगभग असंभव ही होगा. पर इस बात की सम्भावना कम ही दिखती
है. और अगर राज्य-सरकार ऐसा करती भी है तो टी.ई.टी. समर्थक स्वयं सरकार
के बनाये नियमो व प्रक्रिया के अंतर्गत लाखो की संख्या में किये गए
आवेदनों और टी.ई.टी. मेरिट-आधारित चयन के पक्ष में न्यायालय द्वारा दिए
गए निर्णयों का हवाला देते हुए न सिर्फ राज्य-सरकार पर समानता के अधिकार
के हनन का, प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत के हनन का, प्रक्रिया शुरू होने
के बाद नियमों में बदलाव का और कही-न-कही समाज के किसी खास तबके/वोट-बैंक
को नाजायज़ लाभ का आरोप लगाते हुए कोर्ट से राहत मांगने ही वाले है और
उनका पक्ष मजबूत ही रहने वाला है.
ईश्वर करे कि सरकार कि ऐसी कोई मंशा न हो और ये सब मात्र अफवाहें हों, ये
वो पुरानी समाजवादी पार्टी न हो, और सबकुछ सही हो जाये पर विपरीत
परिस्थितियों में भी हमे कहाँ तक जाना पद सकता है ये उसकी झलक मात्र है.
3. क्या टी.ई.टी. समर्थकों का नेतृत्व सक्षम है?
निस्संदेह टी.ई.टी. मोर्चा के लीडरों ने बहुत मेहनत कि है, बहुत समय
लगाया है, बहुत पैसा भी लगाया होगा, पर मेरे विचार से इस आन्दोलन में,
रण-नीतिया बनाने में, उनके पालन में  संवादहीनता एक बड़ी बाधा के रूप में
सामने आई है. इस ब्लॉग से मैं काफी समय से जुड़ा हूँ, इतने लोग यहाँ
दिखते है जो टी.ई.टी.समर्थक है, परेशां हैं  पर राजेश राव जी, मनोज जी,
अर्पण जी, अनिल जी, अखिलेश जी, सुधीर तिवारी जी, रंजन जी, जैसे कुछ लोगो
को छोड़कर कोई भी बड़ा लीडर यहाँ न नियमित रूप से कुछ बताता है, न
राय-मशवरा करता है और सब कुछ अनिश्चितता के अँधेरे में रहता है. कपिल देव
यादव वाली याचिका में मुझे विवेकानंद जी द्वारा झूलेलाल पार्क में धरने
के दौरान और ब्लॉग पर काफी पहले के कमेन्ट के द्वारा पता चला था कि
टी.ई.टी.मोर्चा इस केस में थर्ड पार्टी बन गया है ताकि न्यायालय हमारी
बात भी सुने पर आज भी इस बात कि पुष्टि नहीं हो पी है कि हम इस में थर्ड
पार्टी हैं या नहीं. अगर नहीं तो ये तो सौभाग्य है हमलोगों का कि
न्यायाधीश महोदय ने मामले में खुद ही हस्तक्षेप करते हुए इस याचिका के
औचित्य पर सवाल उठाया वरना स्थिति विपरीत जाने कि स्थिति में हमारा पक्ष
कौन रखता, सरकारी पक्ष तो वैसे ही मौके कि ताक में है कि कैसे मायावती
सरकार द्वारा जारी विज्ञापन निरस्त हो. बुरा न माने, मेरा इरादा आप
लीडरों की नीयत पर ऊँगली उठाने का नहीं है पर आपको देखना चाहिए की लाखो
लोग आपसे उम्मीदें लगाये बैठे हैं, अगर आपसे कोई काम नहीं हो प् रहा तो
बाकि लोगो से सहयोग ले, इस ब्लाग पर भी बड़ी संख्या में लोग हर प्रकार का
सहयोग, समय, धन, जानकारी आदि देने को तत्पर है, ऐसे में आप से किसी काम
में ढील की उम्मीद नहीं की जा सकती. बेहतर परिणाम के लिए सबका एकजुट रहना
जरुरी है, अगर आप अपील करेंगे तो मुझे विश्वास है मात्र इस ब्लॉग से ही
आपको पर्याप्त सहयोग-सूत्र मिल जायेंगे. पर इस मोड़ तक आकर किसी काम में
लापरवाही करना बहुत घटक हो सकता है.

सभी टी.ई.टी. समर्थको से अनुरोध है की न्यायपालिका के बारे में स्तर-हीन
टिप्पणिया करने में संयम बरतें, अगर प्रदेश सरकार या हाईकोर्ट से हमें
राहत नहीं भी मिलती तो भी हमें सर्वोच्च न्यायालय जाना पद सकता है पर आज
के भ्रष्ट राजनैतिक युग में, अपराध-लिप्त राजनीती में आम-आदमी का, आप
जैसे पढ़े-लिखो का सबसे बड़ा सहारा न्यायपालिका ही है, उसमे विश्वास बनाये
रखें, यहाँ देर हो सकती है पर अंधेर नहीं. आशा है, अँधेरा जल्दी छंटेगा,
सुबह जल्दी होगी. वैसे भी रात सबसे काली सबेरे से ठीक पहले होती है,
धैर्य रखें, जागरूक रहें, सक्रिय रहें.

धन्यवाद,
आपका
श्याम देव मिश्रा
मुंबई