Dear Ranjan,
Please publish the matter on blog so that candidates can understand
the situation on the WRIT-A No. 76039/2011 and can decide their next
move.
Thanks.
(अगर कुछ मित्रों को लगता है कि मैं केवल उन्हें झूठा दिलासा देने के लिए
कुछ न कुछ लिखता रहता हूँ तो कृपया अपने विचार जरुर लिखे. वैसे मेरा
मानना है कि यदि किसी भी व्यक्ति, वस्तु या विषय के सकारात्मक पक्ष
ज्यादा मजबूत दिखें तो यह तय हो जाता है कि उसके नकारात्मक पक्षों पर
विजय पाई जा सकती है. चूंकि नकारात्मक पक्ष दिखने वालो की कमी आज संसार
में नहीं है इसलिए मै आपको सकारात्मक पक्ष दिखाने का प्रयास करता रहता
हूँ. )
मित्रों आज आपके लिए ज्यादा कुछ तो नहीं पर जरा सी बात, जो कल अदालती
कार्यवाही के बाद मिली ख़बरों के बाद मुझे समझ में आ रही है, आपसे बताना
चाहता हूँ ताकि आपके मन में छाया निराशा का अँधेरा कुछ कम हो सके. आज तक
टी.ई.टी.उत्तीर्ण अभ्यर्थियों के साथ जो कुछ होता आया है और हो रहा है वह
निहायत दुर्भाग्यपूर्ण रहा है पर कल के अदालत के निर्णय से लग रहा है कि
भर्तियाँ अब शुरू होंगी और इस बार जब प्रक्रिया शुरू होगी तो उसमे कोई
रुकावट नहीं आएगी. माना कि हम सभी को बहुत ख़ुशी होती अगर न्यायालय
विज्ञापन पर से रोक हटा लेता या अदालत द्वारा रद्द किये जाने की दशा में
सरकार संशोधित विज्ञापन निकलती और भर्ती प्रक्रिया शुरू होती. पर यह
अच्छा हुआ कि कल न्यायालय ने एक ऐसा फैसला नहीं किया जिसके खिलाफ निश्चित
तौर पे बी.टी.सी./विशिष्ट बी.टी.सी. वाले अभ्यर्थी पुनः कोर्ट जाते और
मामला फिर लटक जाता. न्यायालय ने मामले को गंभीरता से लेते हुए इस सारे
प्रकरण से सम्बंधित सभी पक्षों की आपत्तियों को ध्यान में रखकर राज्य
सरकार से हलफनामा माँगा है ताकि भर्ती से सम्बंधित सभी प्रश्नों का
समाधान इसी केस के निर्णय द्वारा हो जाये और प्रक्रिया एक बार शुरू होने
के बाद निर्विवाद और निर्विरोध पूरी हो.
ध्यान दें कि यह विज्ञापन "प्राइमरी शिक्षकों" की भर्ती का नहीं, बल्कि
"प्रशिक्षु प्राइमरी शिक्षकों" (एन.सी.टी.ई. के नियमानुसार अध्यापक के
रूप में नियुक्त ऐसे बी.एड.योग्यताधारक जिन्हें नियुक्ति के उपरांत 6 माह
का विशेष प्रशिक्षण करना अनिवार्य है) की भर्ती के लिए जारी किया गया था
क्यूंकि उसे जारी करते समय सरकार/बेसिक शिक्षा विभाग का ध्यान उन लगभग 2
से 3 हज़ार बी.टी.सी./विशिष्ट बी.टी.सी. अभ्यर्थियों की तरफ नहीं गया
जिन्हें एन.सी.टी.ई. के नियमानुसार कोई विशेष प्रशिक्षण प्राप्त करने की
आवश्यकता नहीं है. ऐसे में ये उम्मीद करना कि बी.टी.सी./विशिष्ट
बी.टी.सी. वाले अभ्यर्थी गैरजरूरी ट्रेनिंग करेंगे और सहायक अध्यापक के
वेतनमान के बदले 6 महीने तक प्रशिक्षु अध्यापक का वेतनमान स्वीकार करने
को राजी होंगे, हास्यास्पद है. जाहिर है, ये सवाल उठाना ही था और इसका
हल किये बिना प्रक्रिया पूरी नहीं हो सकती थी और अच्छा हुआ, कि समय रहते
यह सवाल उठा और वर्तमान केस के साथ इसका भी समाधान हो रहा है. यहाँ ये भी
स्पष्ट करना जरुरी है कि बी.टी.सी./विशिष्ट बी.टी.सी. वाले टी.ई.टी.
उत्तीर्ण अभ्यर्थी और बी.एड.डिग्रीधारक अन्य अभ्यर्थी में सिर्फ इतना
फर्क होगा कि उन्हें ट्रेनिंग नहीं करनी होगी और उनकी नियुक्ति
"प्रशिक्षु प्राइमरी शिक्षकों" के तौर पर नहीं, "सहायक अध्यापक" के तौर
पे होगी.
अच्छी बात तो ये हुई कि विज्ञापन और अब तक घोषित सरकारी नीति के अनुसार
चयन की मेरिट टी.ई.टी. के आधार पर बनेगी. और बी.टी.सी./विशिष्ट बी.टी.सी.
वाले टी.ई.टी. उत्तीर्ण अभ्यर्थी और बी.एड.डिग्रीधारक अन्य अभ्यर्थियों
की संयुक्त मेरिट बनाने को लेकर कोई समस्या नहीं आएगी क्यूंकि अगर मेरिट
अकादमिक के आधार पे बनती तो बी.एड. और बी.टी.सी./विशिष्ट बी.टी.सी.
प्राप्तांको को मिलने वाले वेटेज को लेकर नया पेंच पैदा हो सकता था और
दोनों की अलग-अलग मेरिटलिस्ट बनने की दशा में 72825 रिक्तियों में किसको
प्राथमिकता दी जाये, ये सवाल खड़ा होता, पर सिर्फ टी.ई.टी.मेरिट के आधार
पर चयन होने से किसी विवाद की सम्भावना नहीं रहेगी. इन 72825 रिक्तियों
के लिए टी.ई.टी. मेरिट के आधार पर बी.एड. और बी.टी.सी./विशिष्ट बी.टी.सी.
वाले अभ्यर्थियों की संयुक्त मेरिट लिस्ट बनाकर चयन होगा. ऐसे में अब
स्पष्ट हो रहा है कि टी.ई.टी. द्वारा चयन से एक और प्रश्न खुद ब खुद हल
हो जाता है. मेरिट के आधार पर मचे बवाल के बारे में मेरा कहना है कि
वास्तव में अब तक तो टी.ई.टी. मेरिट बनाम अकादमिक मेरिट की बातें सिर्फ
फर्जी पत्रकारों, सरकारी दफ्तरों के जूनियर क्लर्क और चपरासियों की
गप्पों से उडी अफवाह मात्र है जिसे अकादमिक समर्थको ने अपने मन की तसल्ली
के लिए बढ़ा-चढ़ा कर पेश किया है और सशंकित टी.ई.टी. मेरिट-समर्थकों ने
बराबर प्रत्युत्तर देकर इस आग को भड़काया है. भला कोई भी बता सकता है कि
कब मुख्यमंत्री, बेसिक शिक्षा मंत्री, बेसिक शिक्षा सचिव या निदेशक ने
मेरिट के आधार की बात अधिकृत रूप से की है? ये तो वही बात हुई कि सिर्फ
'कौवा कान ले गया!" सुनकर सब कौवे के पीछे भागे पर अपना कान किसी ने छूकर
नहीं देखा.
यह भी बतलाना चाहूँगा कि हो सकता है कि अदालत कपिल देव यादव की नीयत को
जानकर भी विज्ञापन को निरस्त करने को नियम-विरुद्ध होने के कारण, यानि
बी.एस.ए. की जगह माध्यमिक शिक्षा परिषद् के सचिव द्वारा निकले जाने के
कारण, मजबूर हो क्यूंकि कानून सिर्फ नियमों के आधार पर फैसला करती है.
पर विज्ञापन रद्द होने की दशा में भी शिक्षा के अधिकार अधिनियम, 2010 की
शर्तें पूरी करने के लिए राज्य सरकार द्वारा भर्ती की ही जानी है अन्यथा
उसे न सिर्फ केंद्र से मिलने वाली सहायता पर रोक लगेगी और राज्य यह बोझ
नहीं उठा सकता बल्कि शिक्षा का अधिकार अधिनियम के अंतर्गत उत्तर प्रदेश
अपनी नियमावली बनाकर अधिसूचित भी कर चुका है और छात्र-शिक्षक अनुपात पूरा
करने के लिए भर्ती करने को संवैधानिक रूप से बाध्य है. ऐसा न करने पर
किसी व्यक्ति द्वारा जनहित याचिका दायर करने की दशा में अदालत सरकार से
जवाब-तलब कर सकती है, भर्ती के लिए तय नीति और उठाये गए क़दमों का ब्यौरा
मांग सकती है और उसे निर्देश भी दे सकती है. केंद्र सरकार द्वारा भी
अध्यापकों की नियुक्ति को लेकर राज्य पर दबाव है क्यूंकि राज्य केंद्र से
इन भर्तियों से बढ़ने वाले वित्तीय खर्च का 65 % अंशदान ले चुका है. अतः
विज्ञापन रद्द होने की स्थिति में भी सरकार मजबूर होगी कि अपनी भूल
सुधारते हुए नया विज्ञापन निकाले.
पर एक बात ध्यान जरुरी है कपिल जैसे अड़ंगेबाजों द्वारा को ध्यान में
रखते हुए लग रहा है कि अब न्यायालय चाहे कोई भी फैसला दे, बी.एड.
डिग्री-धारकों की प्राइमरी टीचरों के रूप में नियुक्ति तभी संभव है जब
केंद्र सरकार राज्य सरकार के अनुरोध पर समयसीमा बढ़ा दे. हाईकोर्ट ने भी
बी.टी.सी.+टी.ई.टी. उत्तीर्ण आवेदकों पर पहले विचार करने यानि उनसे भर्ती
पूरी करने की बात कही है तो उसका कारण एन.सी.टी.ई. द्वारा बी.एड.
डिग्री-धारकों की प्राइमरी टीचर के तौर पे नियुक्ति के लिए दी गई समय
सीमा, 01.01.2012 तक नियुक्ति न हो पाना हो सकता है. ऐसी स्थिति में भी
राज्य-सरकार सिर्फ बी.टी.सी.+टी.ई.टी. उत्तीर्ण आवेदकों के द्वारा भर्ती
पूरी करने का कदम इसलिए नहीं उठा सकती क्यूंकि सबको पता है कि राज्य में
शिक्षकों की आवश्यकता को पूरा करने के लिए पर्याप्त संख्या में ऐसे
बी.टी.सी. उत्तीर्ण अभ्यर्थी हैं ही नहीं जिन्होंने टी.ई.टी. उत्तीर्ण
किया हो. पर एन.सी.टी.ई. की ख़त्म हो चुकी समय सीमा के आधार पर एक मजबूत
अडंगा लगाया जा सकता है. राज्य सरकार के लिए भी यहाँ केवल 72825
भर्तियों की बात सोचना अदूरदर्शिता होगी क्यूंकि प्राइमरी शिक्षकों की
मौजूदा आवश्यकता, जो लगभग 2 लाख है, को देखते हुए यह विचार भी जरुरी है
कि एक बार अगर राज्य-सरकार ने बी.एड.डिग्री-धारकों को दरकिनार करते हुए
केंद्र से अनुरोध करके उपरोक्त समय-सीमा बढवाने के बजाय फ़िलहाल ये 72825
भर्तिया बी.टी.सी.+टी.ई.टी. अभ्यर्थियों से भर ली तो आगे भी अध्यापकों के
पद सालों तक खाली पड़े रहेंगे क्यूंकि इतने बी.टी.सी.+टी.ई.टी. उत्तीर्ण
अभ्यर्थी न तो अभी प्रदेश में हैं न ही हर साल तैयार होने वाले लगभग
20000 बी.टी.सी. उत्तीर्ण अभ्यर्थी टी.ई.टी. में उत्तीर्ण ही हो जायेंगे,
इस बात की कोई गारंटी नहीं है. ऐसे में प्रदेश आने वाले कई सालों तक
शिक्षकों की भरी कमी से जूझेगा, प्रदेश के नौनिहाल मास्टर-जी की राह
देखेंगे और शिक्षा का अधिकार अधिनियम के उद्देश्य खाक में मिल जायेंगे.
ऐसी स्थिति में पहले तो बी.टी.सी.+टी.ई.टी. उत्तीर्ण अभ्यर्थियों पर पहले
विचार करने का कोर्ट का सुझाव राज्य-सरकार के लिए कतई व्यावहारिक नहीं
होगा. जज महोदय ने जो कमेन्ट किया है वो आज की स्थिति के कानूनी पहलुओं
को ध्यान में रखकर कहा है, पर सरकार को प्रदेश चलाने के लिए अपने विवेक
का भी इस्तेमाल करना है. अगर आज प्रदेश सरकार ने दूरदर्शिता का परिचय
देते हुए अगर समय रहते केंद्र से समयसीमा बढवा ली होती, जो की उसे वैसे
भी करवानी ही पड़ेगी, तो कोर्ट ऐसा नहीं कहता. मौजूदा स्थिति में जज महोदय
कानून के अंतर्गत ही बात कर सकते हैं और एन.सी.टी.ई. के नियम के विपरीत
01.01.2012 के बाद प्राइमरी टीचर के तौर पे बी.एड. डिग्रीधारकों की
नियुक्ति को चुनौती दिए जाने को गलत नहीं ठहरा सकते. पर आनेवाले कल के
मद्देनज़र न सिर्फ राज्य सरकार की मज़बूरी है कि वास्तविक स्थिति को
नकारने की जगह उसे स्वीकारते हुए केंद्र से समयसीमा बढाने का अनुरोध करे
बल्कि शिक्षा के अधिकार का अधिनियम उत्तर प्रदेश जैसे बड़े और महत्वपूर्ण
राज्य में सफलता पूर्वक लागू करने के लिए केंद्र सरकार और एन.सी.टी.ई. को
भी समयसीमा बढाने की अनुमति देनी ही पड़ेगी.
अतः आप मित्रों से निवेदन है कि जहाँ आपने इतना धैर्य रखा है, थोडा और
रखे, इतनी बाधाएँ झेली हैं तो जो बाधाएँ आगे आ सकती हैं, उनसे भी निपटकर
ही आगे बढ़ें, ताकि सीधे मंजिल पर ही जा कर रुकें.
पर ये भी ध्यान रखें कि ये बातें सच होते हुए भी तबतक बेमानी हैं जबतक
इन्हें कोर्ट के सामने न रखा जाये. इसलिए टी.ई.टी. के नेताओं से पुनः
अनुरोध है कि कृपया इन भर्तियों पर आस लगाये बैठे लाखों अभ्यर्थियों की
भावनाओं का ध्यान रखते हुए उन्हें सच-सच बताएं की क्या हम इस केस में
थर्ड पार्टी हैं कि नहीं. आप सब जानते हैं कि अब तो कितनी याचिकाएं इस
याचिका से जुडी हैं, फिर हम पार्टी क्यूँ नहीं बने, अगर हम पार्टी नहीं
बने तो हमारा पक्ष, जिनमे से कुछ का जिक्र अपनी छोटी सी बुद्धि के अनुसार
ऊपर किया है, कौन रखेगा क्यूंकि अन्य पक्ष तो कोर्ट में अपनी अपनी बात
कहेंगे और कोर्ट वही सुनेगा जो उस से कहा जायेगा. कृपया इन नेताओं को
जानने वालों से भी अनुरोध है की वो इनसे ब्लॉग पर आकर स्थिति स्पष्ट करने
और जरुरी कदम उठाने या फिर सीधे-सीधे इंकार करने को कहें ताकि बाकि लोग
इनका भरोसा छोड़कर अपने हिसाब से कदम उठाये. मेरी बात से किसी को ठेस
पहुचे तो कृपया क्षमा करें क्यूंकि मेरा इरादा किसी पर आरोप लगाना नहीं
सिर्फ आपको स्थिति से अवगत कराना है ताकि आप समय रहते क़दम उठा सकें..
धन्यवाद!!
आपका
श्याम देव मिश्रा
मुंबई
Please publish the matter on blog so that candidates can understand
the situation on the WRIT-A No. 76039/2011 and can decide their next
move.
Thanks.
(अगर कुछ मित्रों को लगता है कि मैं केवल उन्हें झूठा दिलासा देने के लिए
कुछ न कुछ लिखता रहता हूँ तो कृपया अपने विचार जरुर लिखे. वैसे मेरा
मानना है कि यदि किसी भी व्यक्ति, वस्तु या विषय के सकारात्मक पक्ष
ज्यादा मजबूत दिखें तो यह तय हो जाता है कि उसके नकारात्मक पक्षों पर
विजय पाई जा सकती है. चूंकि नकारात्मक पक्ष दिखने वालो की कमी आज संसार
में नहीं है इसलिए मै आपको सकारात्मक पक्ष दिखाने का प्रयास करता रहता
हूँ. )
मित्रों आज आपके लिए ज्यादा कुछ तो नहीं पर जरा सी बात, जो कल अदालती
कार्यवाही के बाद मिली ख़बरों के बाद मुझे समझ में आ रही है, आपसे बताना
चाहता हूँ ताकि आपके मन में छाया निराशा का अँधेरा कुछ कम हो सके. आज तक
टी.ई.टी.उत्तीर्ण अभ्यर्थियों के साथ जो कुछ होता आया है और हो रहा है वह
निहायत दुर्भाग्यपूर्ण रहा है पर कल के अदालत के निर्णय से लग रहा है कि
भर्तियाँ अब शुरू होंगी और इस बार जब प्रक्रिया शुरू होगी तो उसमे कोई
रुकावट नहीं आएगी. माना कि हम सभी को बहुत ख़ुशी होती अगर न्यायालय
विज्ञापन पर से रोक हटा लेता या अदालत द्वारा रद्द किये जाने की दशा में
सरकार संशोधित विज्ञापन निकलती और भर्ती प्रक्रिया शुरू होती. पर यह
अच्छा हुआ कि कल न्यायालय ने एक ऐसा फैसला नहीं किया जिसके खिलाफ निश्चित
तौर पे बी.टी.सी./विशिष्ट बी.टी.सी. वाले अभ्यर्थी पुनः कोर्ट जाते और
मामला फिर लटक जाता. न्यायालय ने मामले को गंभीरता से लेते हुए इस सारे
प्रकरण से सम्बंधित सभी पक्षों की आपत्तियों को ध्यान में रखकर राज्य
सरकार से हलफनामा माँगा है ताकि भर्ती से सम्बंधित सभी प्रश्नों का
समाधान इसी केस के निर्णय द्वारा हो जाये और प्रक्रिया एक बार शुरू होने
के बाद निर्विवाद और निर्विरोध पूरी हो.
ध्यान दें कि यह विज्ञापन "प्राइमरी शिक्षकों" की भर्ती का नहीं, बल्कि
"प्रशिक्षु प्राइमरी शिक्षकों" (एन.सी.टी.ई. के नियमानुसार अध्यापक के
रूप में नियुक्त ऐसे बी.एड.योग्यताधारक जिन्हें नियुक्ति के उपरांत 6 माह
का विशेष प्रशिक्षण करना अनिवार्य है) की भर्ती के लिए जारी किया गया था
क्यूंकि उसे जारी करते समय सरकार/बेसिक शिक्षा विभाग का ध्यान उन लगभग 2
से 3 हज़ार बी.टी.सी./विशिष्ट बी.टी.सी. अभ्यर्थियों की तरफ नहीं गया
जिन्हें एन.सी.टी.ई. के नियमानुसार कोई विशेष प्रशिक्षण प्राप्त करने की
आवश्यकता नहीं है. ऐसे में ये उम्मीद करना कि बी.टी.सी./विशिष्ट
बी.टी.सी. वाले अभ्यर्थी गैरजरूरी ट्रेनिंग करेंगे और सहायक अध्यापक के
वेतनमान के बदले 6 महीने तक प्रशिक्षु अध्यापक का वेतनमान स्वीकार करने
को राजी होंगे, हास्यास्पद है. जाहिर है, ये सवाल उठाना ही था और इसका
हल किये बिना प्रक्रिया पूरी नहीं हो सकती थी और अच्छा हुआ, कि समय रहते
यह सवाल उठा और वर्तमान केस के साथ इसका भी समाधान हो रहा है. यहाँ ये भी
स्पष्ट करना जरुरी है कि बी.टी.सी./विशिष्ट बी.टी.सी. वाले टी.ई.टी.
उत्तीर्ण अभ्यर्थी और बी.एड.डिग्रीधारक अन्य अभ्यर्थी में सिर्फ इतना
फर्क होगा कि उन्हें ट्रेनिंग नहीं करनी होगी और उनकी नियुक्ति
"प्रशिक्षु प्राइमरी शिक्षकों" के तौर पर नहीं, "सहायक अध्यापक" के तौर
पे होगी.
अच्छी बात तो ये हुई कि विज्ञापन और अब तक घोषित सरकारी नीति के अनुसार
चयन की मेरिट टी.ई.टी. के आधार पर बनेगी. और बी.टी.सी./विशिष्ट बी.टी.सी.
वाले टी.ई.टी. उत्तीर्ण अभ्यर्थी और बी.एड.डिग्रीधारक अन्य अभ्यर्थियों
की संयुक्त मेरिट बनाने को लेकर कोई समस्या नहीं आएगी क्यूंकि अगर मेरिट
अकादमिक के आधार पे बनती तो बी.एड. और बी.टी.सी./विशिष्ट बी.टी.सी.
प्राप्तांको को मिलने वाले वेटेज को लेकर नया पेंच पैदा हो सकता था और
दोनों की अलग-अलग मेरिटलिस्ट बनने की दशा में 72825 रिक्तियों में किसको
प्राथमिकता दी जाये, ये सवाल खड़ा होता, पर सिर्फ टी.ई.टी.मेरिट के आधार
पर चयन होने से किसी विवाद की सम्भावना नहीं रहेगी. इन 72825 रिक्तियों
के लिए टी.ई.टी. मेरिट के आधार पर बी.एड. और बी.टी.सी./विशिष्ट बी.टी.सी.
वाले अभ्यर्थियों की संयुक्त मेरिट लिस्ट बनाकर चयन होगा. ऐसे में अब
स्पष्ट हो रहा है कि टी.ई.टी. द्वारा चयन से एक और प्रश्न खुद ब खुद हल
हो जाता है. मेरिट के आधार पर मचे बवाल के बारे में मेरा कहना है कि
वास्तव में अब तक तो टी.ई.टी. मेरिट बनाम अकादमिक मेरिट की बातें सिर्फ
फर्जी पत्रकारों, सरकारी दफ्तरों के जूनियर क्लर्क और चपरासियों की
गप्पों से उडी अफवाह मात्र है जिसे अकादमिक समर्थको ने अपने मन की तसल्ली
के लिए बढ़ा-चढ़ा कर पेश किया है और सशंकित टी.ई.टी. मेरिट-समर्थकों ने
बराबर प्रत्युत्तर देकर इस आग को भड़काया है. भला कोई भी बता सकता है कि
कब मुख्यमंत्री, बेसिक शिक्षा मंत्री, बेसिक शिक्षा सचिव या निदेशक ने
मेरिट के आधार की बात अधिकृत रूप से की है? ये तो वही बात हुई कि सिर्फ
'कौवा कान ले गया!" सुनकर सब कौवे के पीछे भागे पर अपना कान किसी ने छूकर
नहीं देखा.
यह भी बतलाना चाहूँगा कि हो सकता है कि अदालत कपिल देव यादव की नीयत को
जानकर भी विज्ञापन को निरस्त करने को नियम-विरुद्ध होने के कारण, यानि
बी.एस.ए. की जगह माध्यमिक शिक्षा परिषद् के सचिव द्वारा निकले जाने के
कारण, मजबूर हो क्यूंकि कानून सिर्फ नियमों के आधार पर फैसला करती है.
पर विज्ञापन रद्द होने की दशा में भी शिक्षा के अधिकार अधिनियम, 2010 की
शर्तें पूरी करने के लिए राज्य सरकार द्वारा भर्ती की ही जानी है अन्यथा
उसे न सिर्फ केंद्र से मिलने वाली सहायता पर रोक लगेगी और राज्य यह बोझ
नहीं उठा सकता बल्कि शिक्षा का अधिकार अधिनियम के अंतर्गत उत्तर प्रदेश
अपनी नियमावली बनाकर अधिसूचित भी कर चुका है और छात्र-शिक्षक अनुपात पूरा
करने के लिए भर्ती करने को संवैधानिक रूप से बाध्य है. ऐसा न करने पर
किसी व्यक्ति द्वारा जनहित याचिका दायर करने की दशा में अदालत सरकार से
जवाब-तलब कर सकती है, भर्ती के लिए तय नीति और उठाये गए क़दमों का ब्यौरा
मांग सकती है और उसे निर्देश भी दे सकती है. केंद्र सरकार द्वारा भी
अध्यापकों की नियुक्ति को लेकर राज्य पर दबाव है क्यूंकि राज्य केंद्र से
इन भर्तियों से बढ़ने वाले वित्तीय खर्च का 65 % अंशदान ले चुका है. अतः
विज्ञापन रद्द होने की स्थिति में भी सरकार मजबूर होगी कि अपनी भूल
सुधारते हुए नया विज्ञापन निकाले.
पर एक बात ध्यान जरुरी है कपिल जैसे अड़ंगेबाजों द्वारा को ध्यान में
रखते हुए लग रहा है कि अब न्यायालय चाहे कोई भी फैसला दे, बी.एड.
डिग्री-धारकों की प्राइमरी टीचरों के रूप में नियुक्ति तभी संभव है जब
केंद्र सरकार राज्य सरकार के अनुरोध पर समयसीमा बढ़ा दे. हाईकोर्ट ने भी
बी.टी.सी.+टी.ई.टी. उत्तीर्ण आवेदकों पर पहले विचार करने यानि उनसे भर्ती
पूरी करने की बात कही है तो उसका कारण एन.सी.टी.ई. द्वारा बी.एड.
डिग्री-धारकों की प्राइमरी टीचर के तौर पे नियुक्ति के लिए दी गई समय
सीमा, 01.01.2012 तक नियुक्ति न हो पाना हो सकता है. ऐसी स्थिति में भी
राज्य-सरकार सिर्फ बी.टी.सी.+टी.ई.टी. उत्तीर्ण आवेदकों के द्वारा भर्ती
पूरी करने का कदम इसलिए नहीं उठा सकती क्यूंकि सबको पता है कि राज्य में
शिक्षकों की आवश्यकता को पूरा करने के लिए पर्याप्त संख्या में ऐसे
बी.टी.सी. उत्तीर्ण अभ्यर्थी हैं ही नहीं जिन्होंने टी.ई.टी. उत्तीर्ण
किया हो. पर एन.सी.टी.ई. की ख़त्म हो चुकी समय सीमा के आधार पर एक मजबूत
अडंगा लगाया जा सकता है. राज्य सरकार के लिए भी यहाँ केवल 72825
भर्तियों की बात सोचना अदूरदर्शिता होगी क्यूंकि प्राइमरी शिक्षकों की
मौजूदा आवश्यकता, जो लगभग 2 लाख है, को देखते हुए यह विचार भी जरुरी है
कि एक बार अगर राज्य-सरकार ने बी.एड.डिग्री-धारकों को दरकिनार करते हुए
केंद्र से अनुरोध करके उपरोक्त समय-सीमा बढवाने के बजाय फ़िलहाल ये 72825
भर्तिया बी.टी.सी.+टी.ई.टी. अभ्यर्थियों से भर ली तो आगे भी अध्यापकों के
पद सालों तक खाली पड़े रहेंगे क्यूंकि इतने बी.टी.सी.+टी.ई.टी. उत्तीर्ण
अभ्यर्थी न तो अभी प्रदेश में हैं न ही हर साल तैयार होने वाले लगभग
20000 बी.टी.सी. उत्तीर्ण अभ्यर्थी टी.ई.टी. में उत्तीर्ण ही हो जायेंगे,
इस बात की कोई गारंटी नहीं है. ऐसे में प्रदेश आने वाले कई सालों तक
शिक्षकों की भरी कमी से जूझेगा, प्रदेश के नौनिहाल मास्टर-जी की राह
देखेंगे और शिक्षा का अधिकार अधिनियम के उद्देश्य खाक में मिल जायेंगे.
ऐसी स्थिति में पहले तो बी.टी.सी.+टी.ई.टी. उत्तीर्ण अभ्यर्थियों पर पहले
विचार करने का कोर्ट का सुझाव राज्य-सरकार के लिए कतई व्यावहारिक नहीं
होगा. जज महोदय ने जो कमेन्ट किया है वो आज की स्थिति के कानूनी पहलुओं
को ध्यान में रखकर कहा है, पर सरकार को प्रदेश चलाने के लिए अपने विवेक
का भी इस्तेमाल करना है. अगर आज प्रदेश सरकार ने दूरदर्शिता का परिचय
देते हुए अगर समय रहते केंद्र से समयसीमा बढवा ली होती, जो की उसे वैसे
भी करवानी ही पड़ेगी, तो कोर्ट ऐसा नहीं कहता. मौजूदा स्थिति में जज महोदय
कानून के अंतर्गत ही बात कर सकते हैं और एन.सी.टी.ई. के नियम के विपरीत
01.01.2012 के बाद प्राइमरी टीचर के तौर पे बी.एड. डिग्रीधारकों की
नियुक्ति को चुनौती दिए जाने को गलत नहीं ठहरा सकते. पर आनेवाले कल के
मद्देनज़र न सिर्फ राज्य सरकार की मज़बूरी है कि वास्तविक स्थिति को
नकारने की जगह उसे स्वीकारते हुए केंद्र से समयसीमा बढाने का अनुरोध करे
बल्कि शिक्षा के अधिकार का अधिनियम उत्तर प्रदेश जैसे बड़े और महत्वपूर्ण
राज्य में सफलता पूर्वक लागू करने के लिए केंद्र सरकार और एन.सी.टी.ई. को
भी समयसीमा बढाने की अनुमति देनी ही पड़ेगी.
अतः आप मित्रों से निवेदन है कि जहाँ आपने इतना धैर्य रखा है, थोडा और
रखे, इतनी बाधाएँ झेली हैं तो जो बाधाएँ आगे आ सकती हैं, उनसे भी निपटकर
ही आगे बढ़ें, ताकि सीधे मंजिल पर ही जा कर रुकें.
पर ये भी ध्यान रखें कि ये बातें सच होते हुए भी तबतक बेमानी हैं जबतक
इन्हें कोर्ट के सामने न रखा जाये. इसलिए टी.ई.टी. के नेताओं से पुनः
अनुरोध है कि कृपया इन भर्तियों पर आस लगाये बैठे लाखों अभ्यर्थियों की
भावनाओं का ध्यान रखते हुए उन्हें सच-सच बताएं की क्या हम इस केस में
थर्ड पार्टी हैं कि नहीं. आप सब जानते हैं कि अब तो कितनी याचिकाएं इस
याचिका से जुडी हैं, फिर हम पार्टी क्यूँ नहीं बने, अगर हम पार्टी नहीं
बने तो हमारा पक्ष, जिनमे से कुछ का जिक्र अपनी छोटी सी बुद्धि के अनुसार
ऊपर किया है, कौन रखेगा क्यूंकि अन्य पक्ष तो कोर्ट में अपनी अपनी बात
कहेंगे और कोर्ट वही सुनेगा जो उस से कहा जायेगा. कृपया इन नेताओं को
जानने वालों से भी अनुरोध है की वो इनसे ब्लॉग पर आकर स्थिति स्पष्ट करने
और जरुरी कदम उठाने या फिर सीधे-सीधे इंकार करने को कहें ताकि बाकि लोग
इनका भरोसा छोड़कर अपने हिसाब से कदम उठाये. मेरी बात से किसी को ठेस
पहुचे तो कृपया क्षमा करें क्यूंकि मेरा इरादा किसी पर आरोप लगाना नहीं
सिर्फ आपको स्थिति से अवगत कराना है ताकि आप समय रहते क़दम उठा सकें..
धन्यवाद!!
आपका
श्याम देव मिश्रा
मुंबई
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